हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हौज़ा ए इल्मिया ईरान के मीडिया और साइबर स्पेस सेंटर के सरबराह हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन रज़ा रुसतमी ने इस क़ौमी प्रोग्राम की इख़्तितामी तक़रीब में, जिसमें मुअल्लिफ़ीन और मीडिया के सरगर्म अफ़राद ने शिरकत की, “रिवायती लिटरेसी” की इस्ट्रेटेजिक अहमियत को उजागर करते हुए कहा कि मौजूदा हालात में तलबा की शनाख़्त रखने वाली तन्ज़ीमों की हिमायत एक क़लीदी हिकमत-ए-अमली है।
दुश्मन के मीडिया एल्गोरिद्म्स के मुक़ाबले के लिए तलबा को “इंसानी मीडिया” के तौर पर फ़आल बनाना नाक़ाबिल-ए-गुरेज़ है।
उन्होंने मीडिया के मैदान में एक इस्ट्रेटेजिक ख़ला की तरफ़ इशारा करते हुए कहा कि दुश्मन एक तरफ़ हमें अपने मतलूबा मॉडल के मुताबिक “मीडिया लिटरेसी” सीखने की तरग़ीब देता है, जबकि दूसरी तरफ़ ख़ुद पूरी ताक़त के साथ “रिवायती लिटरेसी” से फ़ायदा उठाता है, मगर उसका नाम तक नहीं लेता।
अगर हम रुजू करें तो रिवायती लिटरेसी, ख़ुसूसन “रिवायत” को ज़हन-साज़ी के औज़ार के तौर पर देखने के हवाले से, तक़रीबन कोई जामे माख़ज़ या रहनुमा उसूल मौजूद नहीं है। जो चंद तहरीरें इस उनवान से लिखी गई हैं, वो ज़्यादातर “दास्तानी रिवायत” तक महदूद हैं, ना कि “मतलूबा ज़ेहनियत पैदा करने के लिए हक़ीक़त के बयान” के मफ़हूम में रिवायत को बयान करती हैं।
हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन रुसतमी ने इस मसअले का हल “इंसानी मीडिया” की सलाहियत के इस्तेमाल को क़रार देते हुए कहा कि जब प्लेटफ़ॉर्म्स अपनी स्मार्ट फ़िल्टरिंग के ज़रिए इंक़िलाबी मौवद्दा को किनारे लगा देते हैं, तो निजात का वाहिद रास्ता ख़ुद बाशऊर और बासलाहियत इंसानी क़ुव्वतों का मैदान में आना है।
हौज़ा ए इल्मिया के पास अलहम्दुलिल्लाह तख़्लीकी, बासलाहियत और दर्द-ए-दिल रखने वाले तलबा का एक लश्कर मौजूद है। अगर उन्हें रिवायत के हथियार से मुसल्लह किया जाए, तो वो हौज़ा और इंक़िलाब के लिए निजात-दहंदा साबित हो सकते हैं और प्लेटफ़ॉर्म्स की स्मार्ट फ़िल्टरिंग को बेअसर बना सकते हैं।
आपकी टिप्पणी